बुधवार, 12 जुलाई 2023

राह

भटकाव है या जो फितरत है तुम्हारी 

जो तुम अपने रास्ते अलग कर जाओगे 

दर्द हो या तकलीफ या हो कोई बीमारी 

देख लेना एक दिन यूँ बहुत पछ्ताओगे 

राह पकड़ मनमानी ख़ुशी क्षणिक तुम्हारी 

रास्ते अपने बदलने पे मजबूर हो जाओगे 

मंजिल मिलेगी तुम्हे ये कह नहीं सकते 

हर मोड़ पे लेकिन तुम हमें ही पाओगें 

पलटना चाहोगे जो फिर से पीछे तुम 

हर द्वार पे तुम टाला लटकता पाओगें 

जो कोशिश की साथ चलने की तो फिर 

वादा है सफर ख़त्म वही तुम पाओगे 

मंगलवार, 30 अगस्त 2022

झुलसते सपनो के बीच

टूटते सपनो के टुकड़ों पे जो हम सो रहे है
बीतते हर लम्हे में हम खुद को ही खो रहे हैं ।

समझ नही पा रहे अपनी इस मुश्किल का हल
आत्मा है दुखी बह रहे नेत्रों से जल निश्छल।

तलाश में सुकून के दिन भर यूं भागते भागते
मान बैठे आराम ही भागना चाहते ना चाहते।

भटकते भटकते जब इन रास्तों में तुम खो जाओगे
पाकर मेरा सान्निध्य पुनः तुम पथ प्रशस्त कर पाओगे।

याद रखना मैं मिलूंगा उसी जगह पे 
जहा तुम कभी किसी और को न पाओगे।

गीता की कई बार हुई भाषा परिवर्तन
इस बार परिवर्तन पे गीता मैं बताऊंगा।
रचा जिस समय को देखने तेरी ताकत
उस ताकत का रहस्य मैं सुलझाऊंगा।

किया जो तुमने इंतजार जो इतने युग
रखो धैर्य और थोड़ा और जाओ रूक।
गलत वो झेलेंगे जो सही वो भी झेलेंगे
क्योंकि रात या हो सुबह बच्चे तो खेलेंगे।

हैं अधूरी ये कथा ये बात मेरी मान लो
पूरी तुम्हे ही करनी ये व्यथा भी जान लो
हो अगर पढ़ रहे दूसरी बार इस पंक्ति को 
तुम्ही बदलोगे इस जग को ये बात मन में ठान लो।

-अमित(mAit)

गुरुवार, 25 अगस्त 2022

हारती किस्मत से लड़ती मेरी हिम्मत

बढ़ने लगे हद से ज्यादा जग में हैवानियत

जब होने लगे ज़माने भर में हमारी जिल्लत 

कर्म क्षेत्र में हो वक़्त की बेइंतहा किल्लत

संदेह में हो जब हमारी ये सच्ची मासूमियत 

खोने लगे आस्था श्रद्धा भक्ति प्रेरणा ये जगत 

तब खुद से खुद जंग हैं ये समय की जरुरत

मरती उम्मीदों के संग मेरी असंख्य जुर्रत 

पुराने खयालो के रंग मेरी अनूठी जिद्दत 

भिड़ता रोज बचाने को धरा की ये अस्मत  

हारती किस्मत से लड़ती मेरी अनंत हिम्मत। 


-अमित (Mait)




मंगलवार, 23 अगस्त 2022

राजनीति

आया था जो बन एक नए युग का गीत 
आज है दफ़न ओढ़े स्वार्थ का संगीत 

मिल रही जो कुर्सी उसका न कोई मान 
सिर्फ जेब भरने पे ही लोगो का ध्यान 

जो था धर्म का काम खो चूका सम्मान 
हर तरफ हो रहा इसका अपमान 

बढ़ रही कुरीति घेरती अनीति 
लोग समझ रहे इसे राजनीती 

अब भी वक़्त दूर करो ये अज्ञानता
चलो धर्म पथ पर लाओ समानता 

वरना एक दिन ये जग खुद बोलेगा 
लोगो के दिल दिमाग का खून खौलेगा  

कुर्सी तो न दिखेगी तख़्त भी डोलेगा 
सीधा  प्रजा का प्रजा पे शासन होवेगा 

बैठेगा न कोई नेता कुर्सी पे कंप्यूटर बैठेगा 
आवाज होगी जनता की पर मशीन बोलेगा 

लोकतंत्र का नया अध्याय अब जग में घोलेगा 
न किसी को कोई व्यक्ति बेवजह तौलेगा 

-अमित (mAit)

मंगलवार, 16 अगस्त 2022

उलझन

जाएं तो जाए कैसे उस पार
बहाव पानी का बहुत तेज है
खुद को न जानना ही हार
बाकी सब तो सिर्फ जीत है
यूं तो खड़ी थी ट्रेन स्टेशन में
पहुंच न पाया ये खीझ हैं।

सुलगती रही आग कुछ
इस तरह सीने में
खुद को झुलसा दिन रात 
भिगा पसीने में
आने लगा मजा बेपरवाह 
खुशी से जीने में।

-अमित


मंगलवार, 9 अगस्त 2022

कोशिश एक और

जहा तक फैला सको फैला दो कोशिशें हजार
चाहे मिले नाकामी हो पराजय हजार बार
फिर खड़े हो करने पूरी क्षमता से वार प्रहार
जब तक ना पहन लो विजय श्री का हार।

रविवार, 7 अगस्त 2022

साल बीते

आज यूं चलते चलते तुम्हारी याद आ गयी 
तूफान के शोर में ये वीरानी क्यों छा गयी 
संग चलते चलते क्यों ये रस्ते बदल गए
हम कही थे और तुम कही निकल गए। 

तुम साथ थी तो पानी भी शराब लगती थी 
ये अमावस की रात भी गुलजार लगती थी 
न जाने किसकी नजर लगी दिन जो बीती 
बदल गयी समय की गति और परिस्थिति। 

चेहरा चाँद सा ना जाने किस आकाश में है 
खोजने के खातिर दर बदर भटक रहा है
शायद खोज न अब इस जन्म पूरी होनी है 
अब मेरी उम्मीदें खोखली आंखे सूनी है। 

साल बीते अब दो हजार पाँच सौ पांच 
आशा ना छूटी न आयी ना कोई आँच 
सिद्धार्थ से थेरा तक को दुनियाँ जानती
भूली क्यों जसोधरा माया को न मानती। 

-अमित 

शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

सिर्फ तेरा ही नाम होगा।

कल जब इस जहां में गहन अंधकार होगा
इस नजर को तेरा सिर्फ तेरा इंतजार होगा
यूँ तो पीढ़ियां गुज़री हजारों काम करते करते
कोई ना जाने आने वाले कल क्या अंजाम होगा
पर लेने के लायक सिर्फ सिर्फ तेरा ही नाम होगा
हर दिल पर सिर्फ तेरा ही तेरा निशान होगा
हर राह के अंत में तेरा ही मुकाम होगा।
-अमित 

गुरुवार, 4 अगस्त 2022

इतिहास रच जायेगा।

आने वालों का हमें जर्रे जर्रे से इंतज़ार होगा
जब कल सुबह होगी तो दिन गुलज़ार होगा।

किसी का एक तो किसी का हजार बार होगा
दिल है जो मेरा हर किसी का शुक्रगुजार होगा।


खोया था सम्मान उसे पाया जाएगा
सोया था जो शेर उसे जगाया जायेगा
होने को तो अभी भी काफी हैं पर
अपनी ताकत को और बढ़ाया जाएगा
जो उठाते है उंगलियां खामखां हमपर
उन्हें वक्त आने पर दिखा दिया जायेगा
तिरंगा जब फहराएगा करोड़ों घरों में
तब वक्त खुद ही इतिहास रच जायेगा।

बुधवार, 3 अगस्त 2022

चाहत

बिना तेरी चाह के चाहा हर रोज तुझे खुद से भी ज्यादा 

न हुई कोई मुलाकात हमारी न देखी तेरी सूरत दुबारा 

बीते साल पे साल पर न प्रेम हुआ कम पर आँखे नम 

बीत जाये जिंदगी सारी पर हमारी ये उम्मीद है कायम 

मिलेंगे उसी रस्ते पे जिसपे थे कभी एक दूसरे के संग

देखेगा ये जहां एक अधूरे पर अनूठे प्रेम के नूतन रंग। 


-अमित 




मंगलवार, 2 अगस्त 2022

In meeting with soul

I feel the hazards of waste
Filled in many human brain 
Looks like just now normal
But with depth not so formal

With eagernes we all are loosing
Due to lack of inner voice listening
All the people want to do the same
But everyone want name and fame

Let's begin the change in right
Look at the innovative sight
Be the first to hold the light
Make other life more bright

One day there will be only life
Without repetition of the vibes
Signatures of ours in the time
All world smile in my regime.


-MAIT

रविवार, 31 जुलाई 2022

स्वतंत्रता


जिस स्वतंत्रता का सूर्य न होगा कभी अस्त

गान करता देश समस्त, दिन है वो पंद्रह अगस्त। 


जिज्ञासा थी जिस आज़ादी की मिली वो अंशतः 

बाकि है स्थापित होनी सद्भाव सद्मार्ग शांति पूर्णतः। 


७५ वर्ष भी पड़े कम पाने में लक्षित गति 

अब तय करने होंगे त्वरित और तीव्र रणनीति। 


अब बात नहीं करने होंगे सारे लंबित काम तमाम 

वरना आगे होंगे न इतिहास में हमारे तुम्हारे नाम। 


ज्ञान जो एकत्रित किया सदियों से उसका मान रखो 

अनुपयोग पे काम करो सदुपयोग पे जान रखो। 


जो समझे उसे समझाओ वक़्त यूँ अब न बिताओं 

युद्ध के द्वार पर बैठे मायूसी से सर न झुकाओ। 


शायद मुश्किल हो जीत ये लेकिन लड़ना बहुत जरुरी है 

अब आगे तुम सब ये देखोगे यही अंतिम मजबूरी है। 


धर्म युद्ध की इस बेला पर अब हाथ जो न उठा पायेगा

अधर्म का वाहक उसका सर तन से उड़ा ले जायेगा। 


आज शायद ये सोच कर तुम गलत को सह जाओगे 

कल सही खोजने को तुम यूही भटकते रह जाओगे। 


शाम को जब कोशिशों के बाद नींद ना तुम्हें आयेगी 

याद रखना मेरी ही बात तुमको स्वप्न में ले जाएगी।  


शब्द भटक सकते है मेरे अर्थ तुम कुछ भी निकाल लेना 

भावनाओं के मेरे इस भवसागर से तुम स्वयं को बचा लेना। 


-अमित (M AIT )


शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

समेट जरा बिखरकर

सर को झुकाकर 

तन को तुड़वाकर 

साथ सबके मिलकर 

मन की आवाज़ दबाकर 

भाग रही भीड़ इस दंभ पर। 


सोयी दुनियाँ होने भोर पर 

कैसे होगी पार ये दौड़ कर 

शक्ल तो है रंग उस दीवार पर 

पार उसके क्या ये तो तू गौर कर 

साथ अपना दे इस दुनियाँ को छोड़ कर। 


समेट जरा बिखरकर 

उठ जरा सा गिरकर 

हो न बेचैन अब सब्र कर

अपनी धुंध का तू अंत कर

मिलेगी सफलता उसी पथ पर। 


          -अमित(Mait )



सोमवार, 25 जुलाई 2022

शपथ

बीत गई वो रात 
जिसकी करते थे बात
चल पड़े नए पथ पर
लेकर नई शपथ।

अब ये पथिक
न घाव देखेगा अपने
न देखेगा कोई सपने
न देगा कदमों को रुकने
ले शपथ चला अपने पथ।

थाम सको तो थामो हाथ
दे सकते तो दो साथ
न करना विश्वासघात
इतना करो आत्मसात
हो चाहे दिन या रात।

बहुत हुआ ये पथ का पाठ
लक्ष्य से भटके हुए हालात
स्वयं किए तुमने आघात
अब कहते हो क्या हुई बात
थोड़ा तो करो शर्म और लाज
झुक न सको तो स्नेह ही दो
स्नेह न हो तो आदर ही दो
वो भी न हो तो निरादर न हो
जीवन पथ की हो यही शपथ।


"एक सत्य ही एक धर्म सत्यपथ ही सत्यधर्म सनातनम
समय घड़ी ही ईश्वरत्व कालचक्र परमेश्वर आदिअनंतम"

-अमित(Mait)


रविवार, 24 जुलाई 2022

लक्ष्य वही है बस राह बदल गए


कुछ बाते यूँ ही लिखे गए 

विवाद यही कि क्यों न पढ़ें गए

लगता है तुम्हें किताब बदल दिए 

किताब वही हैं बस पन्ने पलट गए। 


कल न किसी ने रोटी खिलाये  

आज मौत पे उसकी नेता भी रो दिए 

खीचने फोटो लोग ये तमाम भिड़े 

गर खुलवा लेते उसके ओठ सिले 

न बुझते देश के गुमनाम दिये। 


कोई रोये कितना अंत में तो हँसे 

मुस्कान हर हाल के चेहरे में दिखे 

न किसी का किसी से दिल दुखे

आशा यही आबाद हर कोई रहे। 


थके कितना नींद सुकून की मिले 

नींद वही है बस ख्वाब बदल गए 

शब्द वही है बस विचार बदल गए 

लक्ष्य वही है बस राह बदल गए। 


-अमित 

मंगलवार, 12 जुलाई 2022

स्मृति

कल रात सोया
सुबह उठा फिर सोया 
सोकर उठा और फिर सोया
ना जाने इस आलस में मैंने
कितने कीमती पलो को खोया।

जब उठा पलंग से 
सूरज दूर क्षितिज से
चमक रहा आग के गोले सा
सूखे गमले में पौधों को
पानी डाल मुस्काया मैं।

सपना जो देखा वो 
स्मृति में ठहरा इस कदर
न भूल सका मैं कई पहर
कोशिश की जब लिखने की
भूला पहला ही अक्षर।

डराते हैं जो सपने 
वो कई बार जगाते भी है
जो लुभाते है अपने
वो कई बार सताते भी है
स्मृति का खेल ये।

-अमित(Mait)




कब चालू होगा

रथ जो ठहरा ये
ज्ञान का
फैले हुए अज्ञान से
पता नही
कब चालू होगा।

रुका जो चक्र ये 
शुद्धता का
फैले हुए प्रदूषण से
पता नही
कब चालू होगा।

बाधित हुआ पथ ये
मानवता का
फैली हुई कट्टरता से
पता नही
कब चालू होगा।


-अमित(Mait)

रविवार, 10 जुलाई 2022

अनूठा सफर

हारती कोशिशों में मैं हूँ 
फस चुका इस कदर 
बीतते हर लम्हे में रहा 
खो अपनी उमर 
अब तो सांसे लेना भी 
होता जा रहा दूभर।

थका हूँ विश्राम से मैं 
हर रोज इस कदर 
उठता हूँ सुबह तो दिन 
जाता है ठहर 
कोशिश आगे बढ़ने की 
पर बीतते सिर्फ पहर। 


उठ गया जो मैं चलने 
अपना ये सफर 
ख़त्म होगी हर मुश्किल 
बनेगा अमृत हर जहर
जहाँ चाह वहाँ राह 
ये एक ही डगर। 


तेरा साथ हो या न हो 
मै चलूँगा हर पहर 
मोह से भी न रुकूंगा 
न कोई गांव न शहर 
ध्येय से पहले न थमेगा 
मेरा ये अनूठा सफर। 

-अमित(Mait )




चुप क्यों हैं तू

चुप क्यों हैं तू,


मैं  नारी हूँ, मैं हारी हूँ
ना तू यह मलाल कर,
ना खड़ी तू देख गलत को,
अब तो तू बवाल कर,

रास्ते  ना मिले तो तू,
खुद की राह निर्माण कर।

चुप क्यों हैं तू,
ना तू अपनी आवाज दबा,
अब तो तू सवाल कर,
ना मिले जवाब तो,
खुद जवाब तलाश कर,
कुछ तो अच्छा ढूँढ़ ले खुद में,
ना मन को यूँ तू उदास कर।

चुप क्यों हैं तू,
जो भी पास है तेरे,
उससे ही तू कमाल कर,
शिक्षित हुआ समाज,
फिर भी कोख़ में मारी है,
ना खड़ी तू देख गलत को,
अब तो तू बवाल कर।

 







हिंदी दिवस मनाने को

जो करे साइन न करे हस्ताक्षर 

न कर सके प्रण जो बच्चो को 

हिंदी माध्यम में पढ़ाने का 

नहीं है अधिकारी वो 

हिंदी दिवस मनाने को

हिंदी नहीं कोई  मंजिल ये तो हैं सफर
कोरोना की चिंगारी पर माँ ये भारी
प्रारम्भ होना चाहिए देश का विकास 

पिता का पत्र हिंदी मूल महाकाल

शोर मत करो बनो परिश्रमी किसान

जो बोओगे वही काटोगे जाओ मान 

हिंदी ही है हिंदुस्तान की जान। 


अमित(MAIT)

 



राह

भटकाव है या जो फितरत है तुम्हारी  जो तुम अपने रास्ते अलग कर जाओगे  दर्द हो या तकलीफ या हो कोई बीमारी  देख लेना एक दिन यूँ बहुत पछ्ताओगे  राह...