मंगलवार, 12 जुलाई 2022

स्मृति

कल रात सोया
सुबह उठा फिर सोया 
सोकर उठा और फिर सोया
ना जाने इस आलस में मैंने
कितने कीमती पलो को खोया।

जब उठा पलंग से 
सूरज दूर क्षितिज से
चमक रहा आग के गोले सा
सूखे गमले में पौधों को
पानी डाल मुस्काया मैं।

सपना जो देखा वो 
स्मृति में ठहरा इस कदर
न भूल सका मैं कई पहर
कोशिश की जब लिखने की
भूला पहला ही अक्षर।

डराते हैं जो सपने 
वो कई बार जगाते भी है
जो लुभाते है अपने
वो कई बार सताते भी है
स्मृति का खेल ये।

-अमित(Mait)




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