शनिवार, 20 जुलाई 2019

जिसको देखो

जिसको देखो वही
रो रहा है किस्मत पे
न चाह कर्म की
न राह धर्म की
अनंत मार्ग के मध्य
शून्य की रौशनी में
चल रहा अविचल
मनुष्यत्व है या छल

कुछ तो दिखाओ
तुम अपना बाहुबल
झुका के दिखाओ
ये सारे दुर्जनो को
उतरो गहराई में
खोजो तुम खुद को
जीतो खुद को
जीतो इस जग को

अगर लिया तुमने ठान
बन के रहोगे तुम महान
किस्मत बन जाओगे खुद के
कहलाओगे खुदा इस जग के।

बुधवार, 12 जून 2019

मुझे जीना आता हैं?

खुश था बहुत ये सोचकर मुझे आता हैं जीना
देख रिक्शेवाले का पसीना भुला मैं पानी पीना
जब मुस्कराहट जो देखी तपन के बाद भी 
जो मिला पूरा पारिश्रमिक उसके हाथों मे
समझ न पाया किसे आता है सच में जीना।।

कुछ बात तो रह जाती है हममें हर बार 
जो दिख नहीं पाती खुद कमियां हज़ार 
देख लेते है कमियां दूसरो की हर बार
खुद के बड़े गुनाह भी लगते है फलदार 
सको तो देखो सबकी खूबियां हजार।

आता है जीना तो जी के दिखाओ यार 
बोलकर लोग कर जाते है जन्नत भी पार
आज की तकलीफ है ये एक कारोबार 
करते है तुलना हर एक से हर एक बार
एक छोटी नाव लगा देती समुन्दर पार।

शनिवार, 8 जून 2019

प्यार

सूखापन ही तो है मौत का कारण
बेरुखी से ये सारे रिश्ते क्यो मरते
पानी जब ना मिले प्यार के चलते
रेगिस्तानों में कांटे ही क्यों खिलते।।

सिक्को की खनक परेशान भले करती
नोटों की परेशानी भीगने में ही है दिखती
रिश्ता हो सिक्को सा तो क्या है उलझन
जो हो शोरदार पर हर हाल काम तो आये।।

हैं भूल नही तो और क्या ये हर दिन की
कभी हैं जो तैयारियां रखि रखी रह जाती हैं
कुछ भूल होती हैं और कुछ ग़लतियाँ मेरी
हँसना हर कोई चाहता है हँसाना ना कोई।।

कुछ पंक्तियां लिख मैं ना पाया सिर्फ ये सोचकर
ना जाने क्या अर्थ निकालेंगे जब सुनेंगे कानभर
ना अर्थ मेरा वो जो हर कोई समझ पाया
न अर्थ मेरा वो जो कोई न समझ पाया
है ये जो अधूरापन वही तो है मेरा आईना
बस समझ सके जो कोई अलिखित पंक्तियों को
तो फिर क्या फर्क मुझमें और तुझमें रह जाएगा।।

शुक्रवार, 7 जून 2019

अनंत अमित अपरिमित प्रकृति

इंसान को दिया प्रकृति ने घरौंदा
उसी इंसान ने प्रकृति को यू रौंदा
देती रही मौका हर बार उबरने का
इंसान ने किया हर एक बार धोखा।।

माना जिसे माँ उसी को लूटा
बदले में उसका दिल भी टूटा
करती रही वो तुम्हारा इंतेज़ार
करो मेहनत और बनो चौकीदार।।

आज बैठा हूं उस रेगिस्तान के पास
जहा कल तक मछलियां खेलती थी
खोज रहा हु उस सुराख को न जाने
जहा सूख गई ये पूरी समुन्दर और झीलें।।

प्रकृति की गोद मे मनुष्य की मनुष्यता है खिलती
कुछ यादें है कैसी जो कभी नहीं मिटती
प्रकृति तो हर इंसान से बराबर प्यार है करती
मानुष की क्षमता क्यो नही प्रकृति से मिलती।।

सोच कर ही खौफ और डर बढ़ जाता है कई हजार गुना
आज एक तालाब तो कल सारी
नदिया सूखने की कगार पर
हसरते तो बहुत थी इमारतों की
पर बिन पानी प्यास कैसे बुझ सके
खरीद लिया जमीन और कारोबार बार बार
पर ला न सका एक छोटा सा  उपवन हरा भरा
जब जरूरत थी इनको बचाने की तब होड़ थी कागज जुटाने की
आज कागज तो जुट चुके लेकिन सब बेअसर हो गए इस जमाने मे।

सोमवार, 29 अप्रैल 2019

अंतर्मन

प्रेम से प्रेम की कीमत तय नहीं की जा सकती 
कीमत तो चीजों की होती है भावनाओ की नहीं 
नापते तौलते तो लोग सांसो को भी है आजकल 
वरना जिंदगी फ़क़ीर भी जीते है राजाओ की तरह 

जरूरते मेरी तय करते आये है जो आज तक 
सुन ले वो सभी जहाँ के अंतिम फलक तक 
ना अब मैं सुनने वाला हूँ उनकी थोड़ी सी भी 
पर चाहूंगा कुछ अधूरा ही सही सुने वो मेरी भी 
 

 

जिसको देखो

जिसको देखो वही रो रहा है किस्मत पे न चाह कर्म की न राह धर्म की अनंत मार्ग के मध्य शून्य की रौशनी में चल रहा अविचल मनुष्यत्व है या छ...